Wednesday, 28 August 2013

आसाराम से आशा

प्रिय आसाराम जी,
आपका प्रेम समाज को क्यों अप्रिय लग रहा हैं । आप तो अपने भक्तों से अपार प्रेम करते है और आपकी लीलाओं में प्रेम को अभिव्यक्त करने के कई तरीके होंगे जिसे समझने में समाज का बौद्धिक स्तर अभी उतना विकसित नहीं हुआ है । तो फिर 15 वर्षीय लड़की उस प्रेम के कैसे समझती जिसने आरोप लगा दिये । मेरे अनुमान है की आप भी मानते होंगे की यह देश में कानून का राज चलता है । लेकिन क्या सिर्फ कानून का ? वैसे भी कानून तो इंसानो के लिए बनाए और लागू किए जाते है । भगवानों के लिए नहीं । यह बात आपके भक्तो के साथ साथ पुलिस और नेतागण तो अच्छी तरह से समझ रहे हैं । मूर्ख मीडिया वाले और कुछ अधर्मी लोग ही नहीं समझ रहे है ।


मुझे यकीन करना चाहिए की आपने अपने भक्तों को आध्यात्मिक बनाया होगा और शायद आप सभी अच्छे और बुरे इंसानो से समान रूप से प्रेम भी करते होगे । इसीलिए कृपया करके मुंबई और दिल्ली के इंसान रूपी दोषियों को भी आप पुलिस से आध्यात्मिक संबंध बनाने की कला सीखा देते तो कुछ उनका भी भला हो जाता । जैसे, कैसे वो गिरफ्तार न होते हुए सिर्फ समन पर सैटल हो लेते, कैसे वो कानून को अपना फर्ज सिखाते की वो इंतिज़ार करे और हाँ अगर ध्यान करना हो या कोई पहले से प्रोग्राम बना हुआ हो तो पुलिस को गिरफ्तारी का टाइम एडजस्ट करना चाहिए । आखिर पुलिस के पास गिरफ्तार करने और कोर्ट में प्रस्तुत करने के अलावा काम ही क्या है । जनता के पास कम होते है जैसे ध्यान करना, प्रवचन करना और सुनना, पूर्वनिर्धारित कार्यों और कार्यक्रमों से वफा करना । हमारे सपनों का समाज बनाने में आप महत्वपूर्ण योगदान दे सकते है जहां पुलिस आम लोगों तो क्या गैर कानूनी लोगों को भी इतना सम्मान और सहयोग दे सके ।


और हाँ, भगवान (रूपी इंसान ) का भी दिल होता है और दिल तो बच्चा भी होता है और नादान भी ।


ऊपर कही गयी बातों का मैं खंडन करता हूँ क्योंकि कानून अपना काम कर रहा हैं और वो कई तरीकों से अपना काम करता हैं । हमारी समझ का दोष है की हम मानते हैं की उसे एक ही तरीके से काम करना चाहिए ।